कौन हैं सच्चा भगवान।

हम सभी धर्मों में सुनते आ रहे हैं की कुल का मालिक एक हैं, वास्तव में सबका मालिक एक ही हैं। पर अब सवाल यह उठता हैं कि आखिर वह सबका भगवान, कुल मालिक , सच्चा भगवान हैं कौन?
वेद प्रमाणित करतें हैं की परमात्मा शसरीर हैं, मनुष्य सदर्श हैं, परमात्मा का नाम (कविर्देव) हैं सतलोक में रहता हैं, वहां से गति करके आता हैं, कमल के फूल पर शिशु रूप धारण करके विरजमान होते हैं। और परमात्मा की परवरिश कंवारी गायो से होती हैं। तथा बड़े होकर एक कवि का आचरण करतें हैं और तत्वज्ञान लोकोक्तियों से तथा कविताओं के माध्यम से सुनाते हैं। 
उस समय लोग परमात्मा को न पहचान कर एक कवि के रूप में मानते हैं।


पवित्रा शास्त्रा भी कविर्देव (कबीर परमेश्वर) के साक्षी 

इसी प्रकार कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने मुस्लमानों को बुरा नहीं कहा है, न ही पवित्र कुरान शरीफ को गलत कहा है, केवल उन काजी व मुल्लाओं को लताड़ा है जो सर्वसमाज को कुरान शरीफ के वास्तविक ज्ञान के विपरीत मनमानी साधना करवा रहे हैं। जैसे पवित्रा वेदों के बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव के विषय में कोई जन्म लेकर अवतार रूप में आना मानते हैं, कोई कभी जन्म न लेने वाला निराकार कहते हैं। उसकी जानकारी तो (धीराणाम्) तत्वदृष्टा संत ही बताएगें। मैं (ब्रह्म) नहीं जानता (यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 10)।  इसी का प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में भी है। जबतक वह तत्वदर्शी संत नहीं मिलेगा तब तक जीव का कल्याण असम्भव है। वह संतअब आ गया है, इन तत्वदर्शी संत रामपाल जी को पहचानों।“पवित्रा कुरान शरीफ में प्रमाण” इसी प्रकार पवित्रा कुरान शरीफ के अध्याय सूरत फुर्कानी सं. 25, आयत 52 से 59 में कहा है कि वास्तव में (इबादइ कबीरा) पूजा के योग्य कबीर अल्लाह है। यह कबीर वही पूर्ण परमात्मा है जिसने छः दिन में सृष्टी रची तथा सातवें दिन तख्त पर जा विराजा, उसकी खबर किसी बाखबर से पूछ देखों। पवित्रा कुरान शरीफ को बोलने वाला अल्लाह स्वयं किसी और कबीर नामक प्रभु की तरफ संकेत कर रहा है तथा कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा कबीर के विषय में मैं भी नहीं जानता, उसके विषय में किसी तत्वदर्शी संत (बाखबर) से पूछो। कविर्देव ने यही कहा था कि मैं स्वयं पूर्ण परमात्मा (अल्लाह कबीर/अकबिरु)हूँ। अपने स्वस्थ ज्ञान का संदेशवाहक रूप में मैं स्वयं ही आया हूँ, मुझे पहचानों। परन्तु ऐसे ही आचार्यों ने पहले भी परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को जनता तक नहीं जाने दिया। कहा करते थे कि कबीर तो अशिक्षित है, यह संस्कृत तो जानता ही नहीं, हम शिक्षित हैं। इस बात पर पहले तो भक्तजन गुमराह हो गए थे, परन्तु अबसर्व समाज शिक्षित है, इन मार्ग भ्रष्ट आचार्यों की दाल नहीं गल रही, न ही गलेगी।सल्लि अला :- ज-स-दि मुहम्मदिन फिल् अज्सादि अल्लाहुम म सल्लि अला कबिर्(कबीर) मुहम्मिद फि़ल् कुबूरि0 फजाईले जिक्र 5. हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है कि कोई बन्दा ऐसानहीं कि ‘लाइला-ह-इल्लल्लाहह‘ कहे और उसके लिए आसमानों के दरवाजें न खुलजायें, यहाँ तक कि यह कलिमा सीधा अर्श तक पहुँचता है, बशर्ते कि कबीरागुनाहों से बचाता रहे।फ़µकितनी बड़ी फ़जीलत है और कुबूलियत की इन्तिहा है कि यह कलिमाबराहे रास्त अर्शे मुअल्ला तक पहुँचता है और यह अभी मालूम हो चुका है कि अगरकबीरा गुनाहों के साथ भी कहा जाये, तो नफ़ा से उस वक्त भी खाली नहीं।मुल्ला अली कारी रह0 फरमाते हैं कि कबाइर से बचने की शर्त कुबूल कीजल्दी और आसमान के सब दरवाजे खुलने के एताबर से है, वरना सवाब औरकूबूल से कबाइर (कबीर) के साथ भी खाली नहीं।बाज उलेमा ने इस हदीस का यह मतलब बयान फरमाया है कि ऐसे शख्स केवास्ते मरने के बाद उस की रूह के एजाज में आसमान के सब दरवाजे खुल जायेंगे।एक हदीस में आया है, दो कलिमे ऐसे हैं कि उनमें से एक के लिए अर्श के नीचे कोईमुन्तहा नहीं।‘ दूसरा आसमान और जमीन को (अपने नूर या अपने अज्र से) भर देµएक ‘लाइला-ह इल्लल्लाह‘ है, दूसरा ‘अल्लाहु अकबर‘ (कबीर) है,

“पवित्रा वेदों में प्रमाण” 

कविर्देव अपने ज्ञान का दूत बनकर स्वयं ही आता है तथा अपना स्वस्थ ज्ञान(वास्तविक तत्वज्ञान) स्वयं ही कराता है।स्वयं कविर्देव (कबीर परमेश्वर) जी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है -शब्द :- 

अविगत से चल आए, कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया(टेक) 

न मेरा जन्म न गर्भबसेरा, बालक हो दिखलाया। काशी नगर जल कमल पर डेरा, वहाँ जुलाहे ने पाया।।

मात-पिता मेरे कुछ नाहीं, ना मेरे घर दासी (पत्नी)। जुलहा का सुत आन कहाया, जगत करें मेरी हाँसी।। 

पाँच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जानुं ज्ञान अपारा। सत्य स्वरूपी (वास्तविक) नाम साहेब (पूर्ण प्रभु) का सोई नाम हमारा।। 

अधर द्वीप (ऊपर सत्यलोक में) गगन गुफा में तहां निज वस्तु सारा। ज्योत स्वरूपी अलख निरंजन (ब्रह्म) भी धरता ध्यान हमारा।। 

हाड़ चाम लहु ना मेरे कोई जाने सत्यनाम उपासी। तारन तरन अभय पद दाता, मैं हूँ कबीर अविनाशी।।

उपरोक्त शब्द में कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि न तो मेरी कोई पत्नी है, नही मेरा पाँच तत्व (हाड-चाम, लहू अर्थात् नाडि़यों के जोड़-जुगाड़ वाली काया) का शरीर है, मैं स्वयंभू हूँ तथा काशी के लहरतारा नामक तालाब के जल में कमल के फूल पर स्वयं प्रकट होकर बालक रूप बनाया था। वहाँ से मुझे नीरू नामक जुलाहा उठा कर ले गया था। जो वास्तविक नाम परमेश्वर का अर्थात् मेरा है (वेदों में कविर्देव, गुरु ग्रन्थ साहेब में हक्का कबीर तथा कुरान शरीफ में अल्लाहकबीरन्) वही नाम मेरा है, मैं ऊपर ऋतधाम में रहता हूँ तथा आप का भगवान ज्योति निरंजन (ब्रह्म) भी मेरी पूजा करता है। इसी का प्रमाण सत्यार्थ प्रकाश सातवें समुल्लास (पृ. 152-153, दीनान गर पंजाब से प्रकाशित) में भी है। स्वामीदयानन्द जी ने यजुर्वेद अध्याय 13 मन्त्रा 4 तथा ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 49 मन्त्रा1 का अनुवाद किया है। जिसमें वेदों को बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है (5त्र ऋग्वेद मं. 10 सु. 49 मं. 1 तथा 6त्र यजुर्वेद अध्याय 13 मं. 4 में) - हे मनुष्यों जो सृष्टीके पूर्व सर्व की उत्पति करता तथा सर्व का स्वामी था, है, आगे भी रहेगा वही सर्वसृष्टी को बनाकर धारण कर रहा है। उस सुख स्वरूप परमात्मा की भक्ति जैसे हम (ब्रह्म तथा अन्य देव भी उसी की साधना) करते हैं वैसे ही तुम लोग भी करो।

अधिक जानकारी के लिए देखें:-
साधना चैनल शाम 7:30 से 8:30 तक
P. C. Tehandesar

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