‘‘सुखदेव की उत्पत्ति की कथा’’

 सरलार्थ :- जिस समय भगवान शिव जी ने पार्वती जी को अमर मंत्रा दिया। उस समयएक स्थान पर सूखा वृक्ष था। उसके नीचे आसन लगाया। कारण यह था कि इस अमर नाम को कोई अन्य जीव सुन ले और वह भी अमर हो जाए और बुरे स्वभाव का जीव यदिआध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न हो जाएगा तो वह उसका दुरूपयोग करके भले व्यक्तियों कोसताएगा। इसलिए सब गुरूजन एकान्त स्थान पर केवल उपदेश देने योग्य हुए व्यक्तियोंको ही बैठाकर नाम देते हैं। भगवान शंकर जी ने अपने हाथों से ताली बजाई जिसका भयंकरनाद (शोर-आवाज) हुआ। आसपास के पशु तथा पक्षी डरकर दूर चले गए। सूखा वृक्षइसलिए चुना था कि कोई पक्षी आएगा तो तुरंत दिखाई देगा। उस वृक्ष की खोखर (वृक्षके थोथे तने) में मादा तोते ने अण्डे पैदा कर रखे थे। एक अण्डा अस्वस्थ था, अन्य स्वस्थथे। वे शंकर जी की ताली (हाथों से की आवाज) से ही पक्षी बनकर उड़ गए। वह खराब(गन्दा हुआ) अण्डा रह गया। जिस जीव को वह अण्डा प्राप्त हुआ था, वह उस अण्डे में बैठाथा। उसके परिपक्व होने तथा स्वयं को शरीर प्राप्त करने का इंतजार कर रहा था।जैसे बच्चा गर्भ में आने से ही माता-पिता उसे अपना मान बैठते हैं। इसी प्रकार जीवजिस शरीर या अण्डे में प्रवेश होता है तो उसे अपना मान लेता है। मृत्यु के उपरांत शमशानघाट पर अंतिम संस्कार के पश्चात् बची हुई हड्डियों के टुकड़ों को उठाकर किसी अथाहदरिया में बहा देते हैं जिसको अस्थियाँ उठाना या फूल उठाना कहते हैं। उसका कारण यहकि जो जीव उस मानव शरीर (स्त्रा या पुरूष) में रहा है, उसका उस शरीर में अधिक मोहहो जाता है। जैसे मानव को कोई असाध्य रोग हो जाता है तो अपने शरीर की रक्षार्थ सर्वधन लगा देता है। शरीर इतना प्रिय लगता है। मृत्यु के उपरांत यदि उस प्राणी को अन्यशरीर नहीं मिला तो वह प्रेत योनि में जाता है। भूत बनकर सूक्ष्म शरीर में रहता है। वहधर्मराज के दरबार (व्िपिबम) से हिसाब करवाता है। यदि प्रेत योनि प्राप्त करता है तो अपनेघर आता है। अपने परिवार के व्यक्तियों से मिलकर बातें करने की कोशिश करता है।कहता है कि क्यों रो रहे हो? मैं आ गया हूँ। परंतु सूक्ष्म शरीर होने के कारण परिवार केव्यक्ति न उसे देख पाते हैं और न उसकी आवाज सुनते हैं। तब उसको अन्य प्रेत बतातेहैं कि ये तेरे को देख नहीं पा रहे हैं क्योंकि तेरा स्थूल शरीर नहीं रहा। फिर वह प्रेत अपनेशरीर की खोज में शमशान घाट पर जाता है। वहाँ शरीर जला दिया गया होता है। अपनेशरीर की शेष बची अस्थियों को अपनी मानता है। उनसे चिपककर रहता है। जब उनअस्थियों को उठाकर दरिया में बहाने जाते हैं तो भी वह जीव उनसे चिपका रहता है। जबदरिया में डाल देते हैं तो वह उनसे अलग हो जाता है। अधिकतर प्रेत वहीं रह जाते हैं, कुछएक उन परिवार वालों के साथ घर आ जाते हैं। यदि अस्थियाँ न उठाई जाएँ तो वह प्रेतबनकर शमशान घाट पर डेरा डाल लेता है, परंतु जिन्होंने परमेश्वर कबीर जी की शरणले रखी है, वे प्रेत नहीं बनते। अनुपदेशी जिन्होंने गुरू से नाम लेकर भक्ति नहीं की, वे प्रेतबनकर कभी शमशान पर, कभी घर या खेतों में या जो भी कारोबार होता है, उसके आसपासघूमते रहते हैं। परिवार के सदस्यों को या अन्य को परेशान करते हैं। इसलिए नकलीगुरूओं की बताई भक्ति से प्रेत बना। फिर उसको ठिकाने लगाने के लिए अस्थियाँ उठाकरदरिया में डालने की रीति (परम्परा) शुरू कर दी। यदि कोई हरिद्वार हर की पौड़ी से वापिसआ जाता और परिवार को परेशान करता तो उसकी गति कराने की परम्परा प्रारम्भ कर दी। तेरहवीं, सतरहवीं, महीना, छः माही, फिर बरसी मनाने लगे। फिर भी बात नहीं बनी।भूत तंग करता रहता तो उसके श्राद्ध प्रारम्भ किए कि अब यह पित्तर बन गया है। उसकीगति के लिए पिण्ड भरवाओ आदि-आदि क्रियाएँ परिवारजनों पर थोंपी गई।उसी स्वभाव से अण्डे से एक जीव चिपका था। श्री शिव जी ने पार्वती जी को पूर्णपरमात्मा की कथा सुनाई जो परमेश्वर कबीर जी से सुनी थी। फिर प्रथम मंत्रा देवी पार्वतीजी को सुनाया। कमलों का भेद बताने लगे। पार्वती जी समाधिस्थ हो गई। पहले तो हाँ-हाँ-हूँकर रही थी। बाद में वह गंदा (खराब) अण्डा स्वस्थ होकर उसमें तोते का बच्चा बन गयाऔर हाँ-हाँ करने लगा। आवाज में अंतर जानकर शिव जी ने पार्वती की ओर देखा तो वहतो समाधि में थी। अंतर दृष्टि से देखा तो एक तोता सर्व ज्ञान सुन चुका था। शिव जी उसतोते को मारने के लिए उठे तो वह तोता उड़ चला। शिव जी भी आकाश मार्ग से उसकापीछा करने लगे। वेदव्यास ऋषि जी की पत्नी ने जम्भाई ली तो उसके मुख के द्वारा तोतेवाला जीव उस ऋषि की पत्नी के शरीर में गर्भ में चला गया। तोते वाला शरीर वहीं त्यागदिया। शिव जी सब देख रहे थे। शिव जी ने वेदव्यास जी की पत्नी से कहा कि आपके गर्भमें मेरे ज्ञान व भक्ति मंत्रा का चोर है। उसने अमर कथा सुन ली है। वह भी अमर हो गयाहै। (जितना अमरत्व उस मंत्रा से होता है) व्यास जी भी वहीं आ गए तथा शिव जी को प्रणामकिया। आने का कारण जाना तो कहा कि हे भोलेनाथ! आप कह रहे हो कि वह अमर होगया है। यदि वह जीव अमर हो गया है तो आप मार नहीं सकते। अब गर्भ में तो आपउसको बिल्कुल भी नहीं मार पाओगे। यह सुनकर शिव जी चले गए। पार्वती जी को समाधिसे जगाया और अपने निवास पर चले गए। जिस स्थान पर शिव जी ने पार्वती जी को अमरमंत्रा दिया था, उस स्थान को ‘‘अमरनामथ’’ के नाम से जाना जाता है। 12 (बारह) वर्ष तकव्यास जी की पत्नी को बच्चा उत्पन्न नहीं हुआ। तीनों देवता (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जीतथा श्री शिव जी) व्यास ऋषि की कुटी पर आए और गर्भ में बैठे जीव से कहा कि आप जन्मलो, बाहर आओ। गर्भ में जीव को अपने पूर्व के जन्मों का ज्ञान होता है। जीव ने कहा,स्वामियो! बाहर आते ही आपकी माया (गुणों का प्रभाव) जीव को भूल पैदा कर देती है। जीवअपना उद्देश्य भूल जाता है। आप अपनी माया को कुछ देर रोको तो मैं बाहर आऊँ। व्यासजी की पत्नी ने कहा कि मेरे गर्भ में लड़का है। मुझे किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। इसलड़के ने सुख दिया है। इसका नाम मैं सुखदेव रखूँगी। तीनों देवताओं ने उसको शुकदेवनाम दिया क्योंकि वह शुक (तोते) के शरीर में भक्ति-शक्ति युक्त हुआ था। तीनों देवों नेकहा कि हे शुकदेव! हम अपनी गुण शक्ति को केवल इतनी देर तक रोक सकते हैं, जितनीदेर गाय या भैंसे के सींग पर राई का दाना टिक सकता है यानि रखते ही गिर जाता है।शुकदेव ने कहा कि ऐसा ही करो।तीनों देवों ने अपनी गुण शक्ति को एक क्षण (ैमबवदक) के लिए रोका। शुकदेव गर्भसे बाहर आया। तीनों देव चले गए। उस समय में 93 (तिरानवें) अन्य बच्चों का जन्म हुआ।उन सबको तथा शुकदेव को अपने उद्देश्य का ज्ञान रहा। वे सब महान भक्त-संत, सिद्धबने। उनमें से 9 (नौ) तो नाथ प्रसिद्ध हुए तथा 84 (चौरासी) सिद्ध बने और एक शुकदेव ऋषि बना। सुखदेव के गर्भ से बाहर आते ही बारह वर्ष का शरीर बन गया। वह उठकरअपनी ओरनाल को (जो नली माता की नाभि से बच्चे की नाभि से जुड़ी होती है। उसकेमाध्यम से माता के शरीर से बच्चे की परवरिश होती है। उसकी लंबाई लगभग 1) फुट तकहोती है।) अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। यह विचार किया कि कहीं दूर जाकर काटफेंकूंगा। कारण यह था कि सुखदेव जी नहीं चाहते थे कि मेरा परिवार में मोह बढ़े और मैंभक्ति नहीं कर पाऊँगा। दूसरी ओर व्यास ऋषि ने कहा कि बेटा हमने तेरे उत्पन्न होने कीबारह वर्ष प्रतिक्षा की है। आप जाने की तैयारी कर रहे हो। हमने बेटे का क्या सुख देखा?आप घर त्यागकर ना जाओ। सुखदेव ने कहा, ऋषि जी! आप वेद-शास्त्रों के ज्ञाता विद्वानहोकर भी मोह के दलदल में फँसे हो। मुझे भी फँसाने का प्रयत्न कर रहे हो। मेरे को अपनेपूर्व जन्मों का ज्ञान है। अनेकों बार आप मेरे पिता बने। अनेकों बार मैं आपका पिता बना।अनेकों बाहर हमने चौरासी लाख प्राणियों के शरीरों में कष्ट उठाए। अबकी बार मुझे मेरेलक्ष्य का ज्ञान है। मैं भक्ति करके अपना जन्म सफल करूँगा। यह वार्ता सुखदेव जी नेअपने माता-पिता की ओर पीठ करके की और आकाश में उड़ गए। पूर्व जन्म की भक्ति सेप्राप्त सिद्धि-शक्ति बची थी, उससे उड़ गया। उसी के अभिमान से कोई गुरू नहीं किया।फिर श्री विष्णु जी ने अपने लोक वाले स्वर्ग से निकाल दिया और कहा कि यदि यहाँ स्थानचाहते हो तो राजा जनक मिथिलेश से दीक्षा लो और भक्ति करके आओ। सुखदेव जी नेवैसा ही किया।
P C Tehandesar

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